हमारी नवीनतम पत्रिका देखें

राम चरित

‘राम लला जन्मभूमि’ लेकर हमने एक विजय तो प्राप्त कर ली, मगर क्या मात्र भूमि के लिए ही हमने इतनी जद्दोजहद की? इस पर हमें विचार करने की आवश्यकता है।
हमें राम का मंदिर मात्र नहीं बनाना है वरन्‌ राम का चरित्र भी जीने की कोशिश करना है। एक राम थे, जिसने पिता की एक आज्ञा पर १४ वर्ष का वनवास सहर्ष स्वीकार कर लिया था, मगर आज तो हम अपने ही माँ-पिता को वृद्धाश्रम का वनवास देने की स्थितियों में हैं।
प्रजा हित मात्र एक धोबी के कहने से अपनी जीवन-संगीनी तक को छोड़ देने की क्षमता रखने वाले राम के चरित्र वाले देश में हम तो प्रजा को रोज अपने स्वार्थ व सिंहासन के लिए उनकी बलि चढ़ा देने की दिशा में ही अग्रसर हैं।
आज समय है कि हम विचार करें कि मात्र ‘राम मंदिर’ बना देने के साथ हम अपने मन के मंदिर में राम विराजित कर अपने माँ-बाप की सेवा के लिए घर को ही मातृ-मंदिर बना सकें।