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वंदे मातरम

लहर लहर दे रही गवाही
र्इंट र्इंट इतिहास सुनाए,
इस मिट्‌टी का ज़र्रा ज़र्रा
उन वीरों की याद दिलाए।

जो साहस के अग्रदूत बन
अंधेरों के पार गए,
प्राणों की आहुति देकर
माँ का कर्ज़ उतार गए।

जिनके यौवन की ज्वाला ने
आग लगा दी सागर में,
जिनके तप की चिंगारी से
जलीं मशालें घर घर में।

लोहे की ज़ंजीरें जिनके
पौरुष को पुचकार गर्इं,
निर्ममता की घातें जिनके
संकल्पों से हार गर्इं।

जिन्हें यानताओं की कारा
विचलित नहीं कभी कर पाई,
जिनके दृढ़ निश्चय के आगे
बर्बरता ने मुँह की खाई।

जलन, थकन, आँसू, पीड़ा से
जीवन भर संग्राम किया,
सदा चले दुर्गम राहों पर
कभी नहीं विश्राम किया।

अपना कोई स्वार्थ नहीं था
अपनी कोई चाह नहीं,
अपने सुख, वैभव की उनको
तनिक रही परवाह नहीं।

दूर सभी से, आज़ादी का
सपना केवल पास रहा,
सच पूछो तो उनका सारा
जीवन ही वनवास रहा।

उनकी निर्भयता के आगे
फाँसी का फंदा शर्माया,
शीश चढ़ाया हँसते हँसते
कभी नहीं पर शीश झुकाया।

मृत्यु पराजित हुई स्वयम्‌ ही
उनका शौर्य नहीं हारा,
अंतिम क्षण भी होठों पर था
वन्दे मातरम्‌ का नारा।
-डॉ. (कर्नल) वी.पी. सिंह